हवन में आम्र काष्ठ निषेध नही है

 होमार्थे समिध: आम्रकाष्ठ-निषेध के अविचारित शास्त्रवाक्यों पर गम्भीर चिन्तन

फेसबुक व सोशल मीडिया पर कुछ अर्ध-पाण्डित्यपूर्ण लेख घूम रहे हैं जो यज्ञ-होम में आम्रकाष्ठ (मँगो वुड) के उपयोग पर पूर्ण निषेध लगा रहे हैं। ये वचन शास्त्र के गम्भीर अध्ययन के बिना लिखे गए प्रतीत होते हैं और साधकों-याज्ञिकों के मन में अनावश्यक संशय उत्पन्न कर रहे हैं।स्पष्ट कर दें — यज्ञकुण्ड में डाले जाने वाले मोटे काष्ठखण्ड समिद्धोम नहीं हैं। वे तो केवल अग्निप्रज्वालन के लिए हैं। वास्तविक होम घृत, शाकल्य तथा ग्रह-समिधाओं से ही होता है। शास्त्र इन मोटे खण्डों को “यज्ञसमिध्” की संज्ञा नहीं देते; लोक-प्रसिद्धि मात्र से उन्हें समिधा कह दिया गया है।समिधा का शास्त्रीय लक्षणयजुर्वेदीय परम्परा में समिधा अंगुष्ठ-प्रमाण मोटी, प्रादेशमात्र (लगभग ७ इंच), छिलके, अग्रभाग एवं पत्रसहित, सीधी, चिकनी (विशाख) होती है।
“समिधो यजति” — समिधाओं द्वारा ही अनेक श्रौत-स्मार्त होमों का विधान है। समिधा एवं इध्म (दोगुनी समिधा) के पृथक् लक्षण शास्त्रों में स्पष्ट हैं।


शास्त्रीय प्रमाण (आम्रकाष्ठ के पक्ष में)कुछ कर्मकाण्ड ग्रन्थों में कर्मभेद से आम्रकाष्ठ को होमार्थ समिध के रूप में स्वीकार किया गया है। मन्त्रमहार्णव में स्पष्ट वचन है:
“आम्रकाष्ठं समानीय पञ्चकोणं च कुण्डलम्।
सप्ताङ्गुलमितान्काष्ठान् जुहुयात् साधकः सदा॥”
अर्थात् — आम्रकाष्ठ लाकर पंचकोण कुण्ड बनाकर सात अंगुल के काष्ठों से साधक सदा होम करे।यजुर्वेद तथा अन्य श्रौत ग्रन्थों में शाखाभेद से १८, २१, २५, २७ एवं २८ प्रकार की यज्ञसमिधाओं का उल्लेख मिलता है। इनमें विभिन्न वृक्षों (पलाश, बिल्व, आम्र, अश्वत्थ आदि) का कर्मानुसार विधान है।तैत्तिरीय ब्राह्मण तथा गृह्यसूत्रों में भी समिधाओं के भेद-उपभेद दिये गए हैं, जहाँ उपलब्धता, शुद्धता एवं कर्म-विशेष को ध्यान में रखकर काष्ठ का चयन करने की छूट है।महायज्ञों में समिद्धतम अग्नि प्रज्वलित करने हेतु आम्रकाष्ठ का प्रयोग न केवल अनुमत है, बल्कि कई परम्पराओं में प्रशस्त माना गया है। यज्ञ-रक्षा और यज्ञ-कर्म की निरन्तरता को सर्वोपरि मानकर, जहाँ जिस काष्ठ की शुद्ध उपलब्धता हो, उसे ग्रहण करना शास्त्र-सम्मत है।मुख्य सिद्धान्त
  • छोटे-छोटे कर्मों में आम्रसमिध् का निषेध कुछ ग्रन्थों में मिलता है।
  • किन्तु बड़े यज्ञों एवं विशिष्ट कर्मभेद में इसका उपयोग शास्त्र-विरुद्ध नहीं है।
  • अविचारित blanket निषेध शास्त्र की सूक्ष्मता को नष्ट करते हैं।
अंत में“यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म” — इस महान परम्परा को बनाए रखने के लिए कर्मकाण्ड के निर्णय को सोशल मीडिया पर प्रसारित करने से पहले परम्परा, गम्भीर शास्त्रार्थ और विशिष्ट चिन्तन अत्यन्त आवश्यक है।कोरा पाण्डित्य समाज में भ्रम फैलाता है, जबकि सच्चा विद्वत्ता संशयों का निवारण करती है। शास्त्र की गहराई को समझें, अर्ध-ज्ञान से बचें और यज्ञ की पवित्रता बनाए रखें।

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