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बलिदान मंत्र व विधि

  बलिदान हाथ में जल अक्षत लेकर-ॐ तत्सदद्य अमुकगोत्रः अमुकशर्मा (वर्षा गुप्तोह) कृतस्य कर्मणः साङ्गतासिद्धचर्थं दशदिक्पालपूर्वकम् आदित्यादि-ग्रहमण्डलस्थापितदेवताभ्यो 'बलिदानञ्च करिष्ये । अग्नि के चारों ओर 10 दिशाओं में दही मिश्रित उड़द को दोना में रखकर एवं प्रत्येक के समीप दीप रखकर-ॐ इन्द्रादिदशदिक्पालेभ्यो नमः सर्वोपचारार्थे गन्धाक्षतपुष्पाणि समर्पयामि, अक्षत, जल को भूमि पर छोड़ दें।। भो भो इन्द्रादिदशदिक्पालाः स्वां स्वां दिशं रक्षत बलि भक्षत कृपां वितरत मम सकुटुम्बस्य सपरिवारस्य आयुःकर्तारः क्षेमकर्तारः शान्तिकर्तारः पुष्टिकर्तारः तुष्टिकर्तारो वरदा भवत, प्रार्थना। शिरसि करौ कृत्वा भूमौ जानुभ्यां पतित्वा क्षमध्वमितिवदेदिति सर्वत्र। एभिर्बलिदानैः इन्द्रादिदशदिक्पालाः प्रीयन्ताम्। ततो ग्रहवेदीसमीपे पत्रावल्युपरि बलिं निधाय आदित्यादिग्रहार्थं बलिद्रव्याय नमः सर्वोपचारार्थे गन्धाक्षतपुष्पाणि' समर्पयामि। ॐसूर्यादिनवग्रहेभ्यः साङ्गेभ्यः सपरिवारेभ्यः सायुधेभ्यः सशक्तिकेभ्यः अधिदेवताप्र त्यधिदेवतागणपत्यादिपञ्चलो कपाल-वास्तोष्पतिसहितेभ्यः एतं सदीपमाषभक्तबलिं समर्पयामि इति जलमुत्सृजेत्...

प्रायश्चित संकल्प , दान संकल्प

  देशकालौ सङ्कीर्त्य, मम इह जन्मनि जन्मान्तरे वा बाल्य- यौवन-वार्धक्यावस्थासु वाक्-पाणि-पाद-पायूपस्थ-श्रोत्र-चक्षुजिह्वा- घ्राण-मनोभिः ज्ञाताज्ञात कामाकाम सकृदसकृत्-कायिक-वाचिक- मानसिक-सांसर्गिकाणाम् आचरितानां समेषां पापानाम् ब्राह्मणनिन्दा-गुरुनिन्दा-माता-पितृनिन्दा-देवनिन्दा-तीर्थनिन्दा- वेद- निन्दा - शास्त्रनिन्दा - माता-पितृ ज्येष्ठ-भ्रातृ गुरु - तिरस्कार - माता-पितृ-गुरुद्रोह-परद्रोह-परनिन्दा-आत्मस्तुतिरूपाणाम्, अस्पृश्य- स्पर्शन-अश्रव्यश्रवण-अचिन्त्यचिन्तन- अयाज्ययाजन अपूज्यपूजन रूपाणाम्, परमर्मोद्घाटन मिथ्या पवाद - मिथ्याभाषण म्लेच्छसम्भाषण हिंसन अवन्द्यवन्दन - अचिन्त्यचिन्तन- अयाज्ययाजन अपूज्यपूजन रूपाणाम्, परमर्मोद्घाटन मिथ्या पवाद - मिथ्याभाषण म्लेच्छसम्भाषण पतितसम्भाषण परस्त्री- सम्भाषण-परस्त्रीगमन-ब्रह्मद्वेषकरण ब्रह्मवृत्तिहरण - परवृत्तिहरण- हीनजाति-सेवन-निषिद्धाचरणरूपाणाम्, शौचत्याग-सन्ध्योपासन- त्याग-तर्पण-बलित्रैश्वदेव नित्य होमत्याग-देवपूजनत्याग - स्वग्राम- त्याग-स्वदेशत्याग-परिवारत्याग कुलत्याग स्वधर्मत्याग-सदाचार- त्याग-शीलत्याग-गुरुत्याग-वेदत्याग-शास्त्रत्याग-आश...

हवन में आम्र काष्ठ निषेध नही है

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  होमार्थे समिध: आम्रकाष्ठ-निषेध के अविचारित शास्त्रवाक्यों पर गम्भीर चिन्तन फेसबुक व सोशल मीडिया पर कुछ अर्ध-पाण्डित्यपूर्ण लेख घूम रहे हैं जो यज्ञ-होम में आम्रकाष्ठ (मँगो वुड) के उपयोग पर पूर्ण निषेध लगा रहे हैं। ये वचन शास्त्र के गम्भीर अध्ययन के बिना लिखे गए प्रतीत होते हैं और साधकों-याज्ञिकों के मन में अनावश्यक संशय उत्पन्न कर रहे हैं। स्पष्ट कर दें — यज्ञकुण्ड में डाले जाने वाले मोटे काष्ठखण्ड समिद्धोम नहीं हैं। वे तो केवल अग्निप्रज्वालन के लिए हैं। वास्तविक होम घृत, शाकल्य तथा ग्रह-समिधाओं से ही होता है। शास्त्र इन मोटे खण्डों को “यज्ञसमिध्” की संज्ञा नहीं देते; लोक-प्रसिद्धि मात्र से उन्हें समिधा कह दिया गया है। समिधा का शास्त्रीय लक्षण यजुर्वेदीय परम्परा में समिधा अंगुष्ठ-प्रमाण मोटी , प्रादेशमात्र (लगभग ७ इंच), छिलके, अग्रभाग एवं पत्रसहित, सीधी, चिकनी (विशाख) होती है। “समिधो यजति” — समिधाओं द्वारा ही अनेक श्रौत-स्मार्त होमों का विधान है। समिधा एवं इध्म (दोगुनी समिधा) के पृथक् लक्षण शास्त्रों में स्पष्ट हैं। शास्त्रीय प्रमाण (आम्रकाष्ठ के पक्ष में) कुछ कर्मकाण्ड ग्...