मलमास मे निषेध
श्रीराम ।
, मलमास (अधिक मास या पुरुषोत्तम मास) में भैरव, काली, दुर्गा आदि देवी-देवताओं की मूर्ति स्थापना (प्राण-प्रतिष्ठा) नहीं हो सकती।
क्योंकि इसमें सूर्य संक्रांति नहीं होती। इसे शुभ कर्मों के लिए अशुभ माना गया है। इसमें निम्नलिखित कार्य स्पष्ट रूप से वर्जित हैं:विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश, यज्ञोपवीत, देव-प्रतिष्ठा / प्राण-प्रतिष्ठा (किसी भी देवता की मूर्ति स्थापना)।
अधिकमास में देव प्रतिष्ठा, यज्ञ आदि निषिद्ध होने के) शास्त्रीय प्रमाण मुख्य रूप से धर्मसिंधु, स्मृति रत्नावली, पुराणों (विशेषकर पुरुषोत्तम मास माहात्म्य) और वैदिक/स्मृति ग्रंथों से मिलते हैं।
प्रमुख श्लोक/वचन:
गृह्यपरिशिष्ट (वैदिक साहित्य से) में अधिकमास (मलिम्लुच) के बारे में स्पष्ट निषेध:
मलिम्लुचस्तु मासो वै मलिन: पापसम्भव: ।
गर्हित: पितृदेवेभ्य: सर्वकर्मसु तं त्यजेत् ॥
अर्थ: मलिम्लुच मास मलिन है और पाप से उत्पन्न हुआ है। यह पितरों और देवताओं से भी गर्हित (निंदित) है। इसलिए सभी कर्मों में इसे त्यागना चाहिए।यह श्लोक सीधे बताता है कि अधिकमास में देव-पितृ संबंधित सभी कर्म (प्रतिष्ठा सहित) वर्जित हैं।
स्मृति रत्नावली से (प्रवृत्त कर्मों के अपवाद सहित):
प्रवृत्तं मलमासात् प्राक् यत् काम्यमसमापितं ।
आगते मलमासेऽपि तत् समाप्यं न संशयम् ॥
अर्थ: जो काम्य कर्म मलमास से पहले शुरू हो चुका है और अधूरा है, उसे मलमास में भी पूरा किया जा सकता है—कोई संदेह नहीं।
(इससे स्पष्ट है कि नए काम्य कर्म जैसे प्रतिष्ठा आदि वर्जित हैं, केवल पुराने अधूरे कार्य पूरे हो सकते हैं।)
पुरुषोत्तम मास माहात्म्य (देवी भागवत पुराण या संबंधित पुराणों से उद्धृत) में अधिकमास की स्थिति बताई गई है कि यह स्वामी-रहित होने से मांगलिक कार्यों (प्रतिष्ठा, यज्ञ, महोत्सव आदि) में वर्जित है। अधिकमास ने विष्णु से प्रार्थना की, तब भगवान ने इसे अपना रूप देकर पुरुषोत्तम मास कहा, लेकिन निषिद्ध कर्मों का नियम बना रहा—केवल विष्णु भक्ति, व्रत, दान आदि विहित।एक प्रसिद्ध उद्धरण (माहात्म्य से):
सीतानिक्षिप्तबीजानिवर्धन्ते कोटिशो यथा ॥
तथा कोटिगुणं पुण्यं कृतं मे पुरुषोत्तमे ॥
अर्थ: जैसे सीता द्वारा बोए बीज करोड़ों गुणा बढ़ते हैं, वैसे ही पुरुषोत्तम मास में किया पुण्य करोड़ गुणा फल देता है। (यह विष्णु पूजा के लिए है, अन्य देव प्रतिष्ठा के लिए नहीं।)
अन्य ग्रंथों में निषेध का उल्लेख:
धर्मसिंधु (काशीनाथ उपाध्याय) में अधिकमास को निषिद्ध कर्मों की सूची में शामिल किया गया है—जिसमें मूर्ति प्राण प्रतिष्ठा, यज्ञ, दीक्षा, विवाह आदि स्पष्ट वर्जित हैं। यह ग्रंथ धर्म निर्णय के लिए प्रमुख प्रमाण माना जाता है।
विभिन्न स्मृतियों और पंचांगों में सामान्य नियम: अधिकमास में सर्वार्थसिद्धि योग न होने से नए शुभ संस्कार (प्रतिष्ठा सहित) नहीं होते।
संक्षेप में: भैरव, काली आदि की नई प्रतिष्ठा मलमास में शास्त्र-निषिद्ध है। पुरानी मूर्ति की नित्य पूजा, जप, अनुष्ठान कर सकते हैं, लेकिन प्राण-प्रतिष्ठा शुद्ध मास (जैसे वैशाख, ज्येष्ठ, फाल्गुन आदि) में ही उत्तम।यदि आप किसी विशिष्ट ग्रंथ का पूरा संदर्भ या और श्लोक चाहें, तो बताएं।
जय जय सीताराम ।
पं. राजेश मिश्र "कण"

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