दीपावली क्यो मनाते है

 जानिये,क्यो मनाते है दीपावली?

 विष्णुना वसुधा लबधा प्रीतेन बलये पुनः। उपकारपरो, दत्तश्चासुराणां महोत्सवः।। ततः प्रभृति राजेन्द्र प्रवृता कौमुदी पुनः।( भविष्य पुराण-उत्तर पर्व अध्याय १४० श्लो़ स.५९-६०)

भगवान वामनरुप धारी विष्णु ने दानवराज बलि को पताल मे स्थापित करदिया। तथा वर्ष भर मे, कार्तिक अमावश्या का एक दिन राजा बलि के नाम कर दिया। इसी उपलक्ष्य मे दीपावली का पर्व मनाया जाता है।।दीपमाला के दिन जो व्यक्ति राजा बलि की पूजा अर्चना करता है, वह वर्षभर आनंदपूर्वक सुख से वयतीत करता है और उसके सारे मनोरथ पूर्ण होते है। इस दिन जो व्यक्ति जिस भाव मे, रता है, वर्षभर उसी भाव को प्राप्त होता है। यदि हर्षित है तो हर्ष, दुःखी है तो दुःख, सुखी है तो सुख, स्वस्थता से स्वास्थ तथा दीनभाव से दीनता को प्राप्त होता है। अतः इस तिथि को प्रसन्न रहना चाहिए। 

दीपावली के दिन अपने सामर्थ्यानुसार,अपने घर को साफ सुथरा कर के, नाना प्रकार के,रंग बिरंगे तोरण, पताकाओ,पुष्पमालाओ,बंदनवारो से सजाना चाहिये।नर नारी बालक वृद्ध सभी को नये वस्त्र पहनकर,कुंकुम चंदन आदि का लेपकर, पान खाते हुए,आनंद पूर्वक नृत्य गीतादिको का आयोजन कर उल्लास एवं प्रीतिपूर्वक दीपोत्सव मनाना चाहिये।संध्याकाल दीपमाला प्रज्वलित कर अनेक प्रकार के दीप वृक्ष खडे करने चाहिये। कन्याओ को दीप वृक्षो पर धान का लावा फेंकते हुए दीपको से आरती करनी चाहिये। दीपमाला जलाने से,संध्याबेला दोषरहित हो जाती है।राक्षसो का भय नही रहता।

भविष्यपुराण अ.१४० श्लो.५१-६९

पं. राजेश मिश्र

आजमगढ.

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